Sunday, March 27, 2011

था कोई अजनबी. दिल जो हमारा ले गया, था कोई अजनबी. एक सहारा सा दे गया था कोई अजनबी. रुख्शत किया हमें उसने इतनी बेरुखी से, और सिकवा दे गया था कोई अजनबी. जिंदगी है छोटी और रास्ते है लम्बे, तनहा जो छोड़ गया,था कोई अजनबी. गम नहीं है ज़ख्मों का,जो अपनों से मिला, जो दिल तोड़ के गया, था कोई अजनबी. आखें जो ढूंढ़ती है, वो तस्वीर नहीं कोई, जो ख्वाबों में छा गया. था कोई अजनबी.. नीतीश कूमार Mob.-9534711912

Friday, March 11, 2011


गोरखनाथ में गोरखधंधा

पटना।। पैरंट्स सावधान ! पटना में साइबर कैफों में छापे के दौरान कॉन्डम मिले और करीब 40 जोड़ों को आपत्तिजनक हालत में पाया गया। एक साइबर कैफे में तो क्यूबिकल्स में बेड तक लगे हुए थे। पुलिस ने बताया कि इनमें से ज्यादातर कपल्स अच्छे परिवार से ताल्लुक रखने वाले 16 से 18 साल के टीनएजर्स हैं। एसपी ( सिटी ) शिवदीप लांडे ने बताया कि गांधी मैदान, कदमकुआं, पीरबहोर, कोतवाली और बुद्धा कॉलोनी के 12-13 साइबर कैफों में छापे के दौरान हमने जो देखा वह चौंकाने वाला था। उन्होंने बताया कि रेड पड़ते ही टीनएजर कपल्स ने भागने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। सबको थाने ले जाया गया लेकिन लड़कियों को वॉर्निंग देकर छोड़ दिया गया। एसपी सिटी ने कहा कि उनकी हिरासत से परिवारों की प्रतिष्ठा को धक्का लगता, इसलिए यह कदम उठाया गया। लड़कों को हिरासत में लेने के बाद उनके पैरंट्स को बुलाया गया और पर्सनल बॉन्ड भरवाने के बाद छोड़ गया। पुलिस ने कहा कि जिन साइबर कैफों से कॉन्डम मिले हैं, उनके मालिकों को गिरफ्तार किया जाएगा। दरअसल, पुलिस को लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं कि साइबर कैफों की आड़ में कुछ और ही खेल चल रहा है। इसके मद्देनजर कई थाना क्षेत्रों की पुलिस ने विशेष जांच अभियान छेड़ा। बोरिंग रोड के गोरखनाथ काम्प्लेक्स में लगभग एक घंटा तक चली कार्रवाई के दौरान लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। चार कैफों में आपत्तिजनक सामान भी मिला है। सात लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। कई कैफों में सिंगल एंट्री पर 10 और कपल के साथ 20 रुपये की रेट लिस्ट भी कहानी बयां कर रही थी। क्यूबिक में कंप्यूटर के साथ दराज में आपत्तिजनक कॉन्डम रखने वाले साइबर कैफों ने केबिन के प्रति घंटा रेट काफी ऊंचा रखा है।

आपको ये भी याद दिलाते चले की एक दिन पहले ही पटना पुलिस ने राजा बाज़ार स्थित चौरसिया रेस्तरां में छापा मारकर काफी लड़के लड़कियों को पकड़ा था.
और तब भी काफी अफरातफरी का माहौल था....

पर आज ऐसे जगहों पर छापा मारना तो सही है पर इस से एक सवाल भी पैदा होता है....
आज जहा हमारे संबिधान में LIVE IN RELATIONSHIP की बात हो रही है वही ऐसे जगहों पर छापा मरना कितना सही है?
ये सवाल मै साइबर कैफे को लेकर नहीं बल्कि रेस्तरां में मारे गये छापे को लेकर उठा रहा हूँ.
सोचने वाली बात ये है की अगर लड़का लड़की राज़ी है तो किसी को फिर क्या दिक्कत है??
और LIVE IN RELATIONSHIP के अंतर्गत हमारी संबिधान भी तो यही कहती है..

आप इस पर अपनी राय जरुर दे.

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Nitish kumar

Mob.- 9534711912

Tuesday, March 8, 2011

TUM MERI JAAN HO

Meri Rooh Nikalne Wali Hogi

Meri Sans Bikharne Wali Hogi
Phir Daman Zindgi Ka Chute Ga

Dhaga Sans Ka Bhi Tute Ga
Phir Wapis Hum Na Aayenge

Phir Hum Se Koi Na Roothe Ga
Phir Ankhon Me Noor Na Hoga

Phir Dil Gham Se Choor Na Hoga
Us Pal Tum Hum Ko Thamo Ge

Humay Dost Apna Mano Ge
Phir Hum Na Kuch B Bolien Ge

Ankhen Bhi Na Kholien Ge
Us Pal Tum Ro Do Ge

{BAS PHIR TUM HUM KO KHO DO GAY}

Tum Aksr Sochty Hon Gy

Hum Tumhein Yaad Nhi Krty
Tumhein Hum Bhool Jate Hein

Mgar Ye Bhool Tumhari Hy
Asal Mein Baat Kuch Yun Hy

K Jab Tum Yaad Aate Ho
To Kuch B Yaad Nahi Rehta

Or Tumhari Yaad Mein Kho Kr
Hum Batana Bhool Jate Hein

K Tum Kitna Yaad Aate Ho..!

Dedicated To My LOVE "SweetU"

Thursday, January 6, 2011


पापी पेट के खातिर


चिराग जलाने की कोशिश,

घर हमने जलते देखा है,

पेट पालने की खातिर,

कोई पेट मैं पलते देखा है,


भूखी माँए रोते बच्चे,

तन नंगा और मन नंगा,

एक दिन के चावल को ही,

हो जाता है बदन नंगा,

इस युग मैं हर मोड़ पे हमने,

सीता को हरते देखा है,


खुश दिख कर यहाँ करने पड़ते,

बदन के सौदे रातों मैं,

बदन के लालची भेडिये,

रहते सदा ही घातों मैं,

यहाँ द्रोपदी को चीर हरण,

खुद अपना करते देखा है,


सोने वाले सो नही पते,

रात यहाँ सो जाती है,

जग की जन्म देनी माँ,

खुद गर्त मैं खो जाती है,

पेट की खातिर खुद ही हमने,


खुद को छलते देखा है,

चिराग जलाने की कोशिश,

घर हमने जलते देखा है,

पेट पालने की खातिर,

कोई पेट मैं पलते देखा है,


नीतीश कुमार

Mob.- 9534711912

Saturday, January 1, 2011



हुनर के धनि कलाकार को है मंच की तलाश

जिन्दगी एक अभिलाषा है, क्या गजब इसकी परिभाषा है.
संवर गई तो दुल्हन और बिखर गई तो तमाशा है.

प्रसिद्ध कवि दुष्यंत की ये पंक्तियाँ हर किसी की जिन्दगी पर बिलकुल सटिक बैठता है. कहते है जब किसी इंसान में हुनर हो तो मंजिल खुद उसका कदम चूमती है. पर हमारे बीच एक ऐसे व्यक्ति भी है जिनमे हुनर तो कूट-कूट कर भरा हुआ है पर अपनी पहचान बनाने के लिए वो दर दर भटक रहा है. ये है नवादा जिले के रामनगर निवासी विकास विश्वकर्मा जो महज 20 साल की उम्र में बिना कोई प्रशिक्षण लिए हर योगाभ्यास कर लेता है.
बाबा रामदेव को अपना आदर्श मानने वाला विकास हर व्यक्ति तक योग शिक्षा पहुचना चाहता है. गौरतलब हो की योग के प्रति रुझान के कारन वह शरीर को रबड़ की तरह मोड़ लेता है. इतना ही नहीं वह अपने ज्ञानेन्द्रियों को भी वश में कर लेता है जिससे शारीर को कुर्सीनुमा बनाकर बिना टेबुल के सहारे ही भोजन कर सकता है. ज्ञानेन्द्रियों पर वश ऐसा की वह अपने बाल को आगे पीछे, पेट को फुटबाल नुमा और कान को जिस तरह चाहे घुमा सकता है. हाथ पीछे कर के भोजन करना और लोगों को पीछे से प्रणाम करके वह सभी को आश्चर्य में डाल देता है. कला का धनि विकास अनेक कलाकार की आवाज़ भी निकालता है. विकास की आवाज़ में मिथुन, अजीत, जगदीप, सत्रुघ्न सिन्हा, एहशान कुरैशी के आलावा विविध भारती के प्रसिद्ध एनाउंसर अमीन शयानी भी शामिल है.
इतना हुनर होते हुए के वावजूद भी विकास को तलाश है एक ऐसे मंच की जो उसे पहचान दिला सके. अपने मार्ग में वह गरीबी को सबसे बड़ा रोड़ा मानता है. विकाश कहता है की ये सब कलाबाजियां उसमे ईश्वरीय देन है, लेकिन प्रशिक्षण की अभाव में उसे इन कलाओं की बारीकियों और इससे होने वाले लाभ के बारे में उसे नहीं पता है.
विकास के पिता वासुदेव विश्वकर्मा जो पेशे से ड्राईवर है बताते है की विकास को बचपन से ही योग के प्रति गहरा रुझान रहा है पर आर्थिक स्थिति दयनीय रहने के कारन ही उसका विकाश बाधित है. उन्होंने जिला प्रशासन से उमीद जताते हुए सहयोग की मांग भी की थी पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ. वो चाहते है की विकास अपने प्रदेश और राज्य का नाम रौशन करे जिसके लिए वो कला एवं सांस्कृतिक विभाग से सहयोग की उमीद जताते है.विलक्षण कलात्मक प्रतिभा का धनि विकास की उड़ान ऊँची हो सकती है, बशर्ते आर्थिक संसाधनों की कमी दूर हो.

नितीश कुमार
इन्द्रपुरी, पटना

Mob.- 9534711912

Monday, December 27, 2010


निजी शैक्षनिक संस्थाओं की गिरफ्त में पुस्तक मेला

पटना: 19 अगस्त,2010
आह मुझे बचाओ-आह मुझे बचाओ!!
ये दर्द किसी लाचार या विवश व्यक्ति की नहीं बल्कि अक्षरों का संग्रह कही जाने वाली पुस्तकों की है. हम बात कर रहे है पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान की जो इस समय दुल्हन की तरह सज कर तैयार है, मौका है पुस्तक मेले का.
वैसे ये बड़े गौरव की बात है की इस वर्ष हम कुछ कवियों की जन्म शताब्दी मना रहे है. इन कवियों में बहुप्रसिद्ध जनकवि नागार्जुन, अब्दुल फैज और अग्य का नाम सबसे ऊपर आता है. कहने को फैज के नाम से प्रवेश द्वार है, अग्य का नाम प्रसाशनिक भवन पर अंकित है और नागार्जुन का नाम भी मुक्ता आकाश मंच पर है. पर सच माने तो होर्डिंग्स, फ्लैक्स और विभिन्न संस्थाओं की बैनर की भीड़ में इनके नाम पर नजर जाती ही नहीं. आजकल के युवा तो इन कवियों का नाम तक नहीं जानते. ऐसे में इनकी जन्म शताब्दी वर्ष मानाने का ये तरीका महत्वहीन साबित होता है.
कहने को तो ये पुस्तक मेला है पर ये पूरी तरह से निजी शैक्षनिक संस्थाओं की गिरफ्त में है. पुरे पुस्तक मेले में जहाँ भी जाये किसी न किसी शैक्षनिक संस्थाओं की बैनर दिख ही जाती है. इतना ही नहीं पुस्तक मेले के प्रवेश टिकट पर भी ऐसे ही शैक्षनिक संस्था का मुहर है. ऐसे में किताबों की नगरी बाज़ार की तरह प्रतिक होती है.
इस से अलग इस पुस्तक मेले में अनेकों खामियां है जो इसके प्रसाशनिक विभाग पर सवालिया निशान खड़ा करती है. पुस्तक मेला पूरी तरह धुल से सना हुआ है, और ध्वनि प्रदुषण भी चरम पर है. शैक्षनिक संस्थाओं के प्रचार की गूंज में महत्वपूर्ण जानकारियां हमारे कानों तक पहुचती ही नहीं. और किसी भी छोटी-बड़ी घटनाओं के लिए अन्दर कोई प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नहीं है.
मेले में बिहारशरीफ से आये एक पुस्तक प्रेमी विकाश दुबे जो पेशे से किसान है का कहना है की ये पुस्तक मेला नहीं बल्कि लूट मेला है. यहाँ सभी किताबों का दाम काफी ज्यादा है जो बाहर कम मूल्यों में उपलब्ध है. एक अन्य पुस्तक प्रेमी पटना के नवीन की माने तो यहाँ विभिन्न सुविधाओं की कमी है और यहाँ नामचीन पुस्तक प्रकाशक नहीं है.
उदघाटन समारोह में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अंतराष्ट्रिय प्रकाशनों को बुलवाने की बात कह रहे थे जिस से इस पुस्तक मेले की गरिमा और बढे. पर मेले की ऐसी स्थिति में "पयोनीर" और अन्य नामचीन प्रकाशनों को यहाँ बुलवाना मुस्किल लग रहा है. अगर हमें पटना पुस्तक मेले को अंतराष्ट्रिय पहचान दिलानी है तो इन सभी कमियों को दूर करना होगा और मेले पर हावी होता बाजारवाद को रोकना होगा.
नीतीश कुमार
इन्द्रपुरी,पटना
Mob.- 9534711912, 9263633170

जिंदगी से होकर मजबूर , समाज मे बढ़ रहे बाल मजदूर

बच्चे परिवार, राज्य और देश के भविष्य होते हैं. लेकिन तब जब परिवार, राज्य और देश उन्हें खुशहाल जीवन जीने की सारी सुभिधाएँ उपलब्ध कराए. किंतु जब यही बच्चे महज खेलने और पढ़ने की उम्र मे अपने कंधे पर परिवार के भरण-पोषण के लिए हड़तोड़ मेहनत करने को मजबूर हो जाये तो उन्हें परिवार, राज्य और देश का भविष्य कैसे कहा जा सकता है?
हम बात कर रहे है देश मे ऐसे लाखों बाल मजदूरों की. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है की हमारा देश वैसे देशों की श्रेणी में गिना जाता है जहाँ बाल मजदूरी चरम पर है. इतना ही नहीं इन बाल मजदूरों से बेहद अधिक काम लिया जाता है और बदले में इन्हें काफी कम मेहनताना दिया जाता हैं. ठिठुरते ठण्ड और झुलसते गर्मी में हाड़तोड़ मेहनत करने के बावजूद बाल श्रमिकों को मजदूरी के नाम पर नाममात्र रूपये का भुगतान किया जाता है. इन सब के बावजूद हर छोटी-छोटी बातों पर इन्हें मालिकों की दुत्कार सुननी पड़ती है. कचरा, पलास्टिक, पेपर चुनने वाले, स्टेशनों पर अखबार या खाने – पीने की सामग्री बेचने वाले या जूते पॉलिस कर अपना पेट पालने वाले ये मजदूर प्रत्यक्ष रूप से किसी के अधीन तो काम नहीं करते पर समाज में इनका शोषण किया जाता है. समाज के भेडियें और दरिन्दे इन बाल मजदूरों का यौन शोषण करने में भी पीछे नहीं रहते.
बेहद कम उम्र में मेहनत मजदूरी और मानसिक तनाव के कारण ऐसे बच्चों की मानसिक विकाश भी रुक जाती है. गलत संगती में पड़ कर ऐसे बच्चे तम्बाकू, शराब और अन्य नशीली पदार्थों का सेवन भी करने लगते है.
ऐसा नहीं की सरकार की नजर इन पर नहीं पड़ती. सरकार ने ऐसे अनेकों कानून बनाये है जिस से बाल मजदूरी को रोका जा सके. कितने ऐसे एनजीओ भी बाल मजदूरी रोकने के लिए कार्य कर रही है फिर भी इस अभिशाप से छुटकारा पाना मुश्किल साबित हो रहा है.
हाल ही में खबर मिली की बिहार के बेगूसराय जिले में बरौनी रेलवे जंक्शन से रेल सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने पश्चिम बंगाल के 12 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है और इस मामले में लिप्त दो ठेकेदारों को गिरफ्तार किया है. अधिकारियों की मानें तो सभी बाल श्रमिकों ने किशनगंज से महानंदा एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी थी और वे पंजाब के लुधियाना में आलू के खेतों में काम करने जा रहे थे. गिरफ्तार किये गये दोनों ठेकेदारों ने दावा किया की बाल श्रमिकों के अभिभावकों को इसकी जानकारी दी गयी थी और इसके बदले उन्हें एक से दो हज़ार दिए गये थे.
एक अन्य जानकारी के मुताबिक ऐसी ही घटना देश की राजधानी से मिली. बाल मजदूर के रूप में दिल्ली ले जाए गए झारखंड के तीन लड़के एवं एक लड़की को वापस लाने में स्वयंसेवी संगठनों ने सफलता हासिल की. इन बच्चों को नजदीकी रिश्तेदारों ने ही काम दिलाने के बहाने एक घर में छोड़ दिया था.
ऐसी घटनाओं पर गौर करें तो ये बात सामने आती है की बाल मजदूरी के लिए सरकारी साहूकारों से ज्यादा हम सभी जिम्मेदार है. आखिर इसे अपने घर समाज से मिटाने के लिए पहल तो हमें ही करना पड़ेगा. तो इस नन्हे मासूम की सार्थक और उज्जवल भविष्य के लिए इनके हाथों में मज़बूरी की जंजीरों से बांधने के बजाय हमें इन्हें अक्षरों की दुनिया में खेलने के लिए भेजना चाहिए.
तभी देश के भविष्य कहलाने वाले ये बच्चे अपना हुनर निखार सकेंगे और देश के विकाश में मजबूत नीव खड़ा करेंगे.

नीतीश कुमार
इन्द्रपुरी,पटना
Mob.- 9534711912, 9263842363