Wednesday, January 23, 2013

क्या जरुरत नेताओं के बहस की

लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए जरूरी है कि किसी मुद्दे पर गंभीर बहस की जाए। लेकिन, संसद में पहुंचने वाले लोगों के भीतर बहस की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। अब यहां जल्दबाजी में विधेयक पारित किए जाने लगे हैं।लोकतंत्र में संसदीय बहस की परंपरा को मजबूत करने के लिए काम करने वाली संस्था ‘पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च’ के अध्ययन के अनुसार 14वीं लोकसभा के अंतिम दिन 17 मिनट के भीतर आठ विधेयक पारित किए गए। इससे पता चलता है कि विधेयक के पारित होने से पहले उसपर कितनी गंभीर बहस हुई होगी।
अध्ययन में इस बात का जिक्र है कि वर्ष 2008 के दौरान संसद ने वित्त व विनियोग से संबंधित 32 विधेयक पारित किए। इनमें से कई विधेयक बिना बहस के पारित हुए। अध्ययन के मुताबिक 28 प्रतिशत विधेयक 20 मिनट से कम बहस के बाद पारित किए गए, जबकि 19 प्रतिशत विधेयक पर एक घंटे से कम समय तक बहस किया गया।
इस संबंध में विपक्षी सांसदों का कहना है कि सरकार ने जल्दबाजी में काम किया।
कई नेता मानते हैं कि चर्चा के बिना किसी विधेयक का पारित होना ठीक परंपरा की निशानी नहीं है। लेकिन, अधिकत्तर मामलों में विधेयक पारित कराने के लिए सरकार जल्दबाजी में रहती है।

Tuesday, January 22, 2013

घंटा करप्शन जाएगा



सारण के डीआइजी पर रंगदारी मांगने के आरोप के खुलासे के 24 घंटे के भीतर राज्य सरकार ने उन्हें पद से हटा दिया. सोमवार को डीजीपी ने पूरे मामले की जानकारी मुख्यमंत्री को दी. इसके बाद देर शाम एडीजी (हेडक्वार्टर) रवींद्र कुमार ने आलोक कुमार को हटाये जाने की जानकारी दी. अब डीआइजी से पूछताछ की तैयारी चल रही है. अधिकारियों ने कहा, साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी.
पटना: शराब कारोबारी से 10 करोड़ रुपये रंगदारी मांगने के आरोप में घिरे सारण के डीआइजी आलोक कुमार को सोमवार को पद से हटा दिया गया. उनकी जगह डीआइजी (होमगार्ड) एस मलार विजी को सारण का नया डीआइजी बनाया गया है. राज्य सरकार ने आलोक कुमार को पुलिस मुख्यालय में बुला लिया है. फिलहाल वह पदस्थापन की प्रतीक्षा में रहेंगे. शराब बनाने वाली कंपनी दून वैली डिस्टिलरी के कर्मचारी टुन्नाजी पांडेय ने आलोक कुमार पर दस करोड़ रुपये रंगदारी मांगने का आरोप लगाया था. जांच में यह आरोप सही पाये गये. इसी मामले में रविवार को तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जो कथित तौर पर डीआइजी के एजेंट की भूमिका में थे. पांच लाख रुपये नगद भी बरामद किये गये थे.
सोमवार को डीजीपी अभयानंद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिले और पूरे मामले की जानकारी दी. सोमवार को दिन भर आला अधिकारियों की बैठक चलती रही.
सूत्रों के मुताबिक, आर्थिक अपराध इकाई 1997 बैच के आइपीएस अधिकारी आलोक कुमार से पूछताछ भी कर सकती है. आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद आरोपित डीआइजी से इंडियन पैनल कोड (आइपीसी) के अधिकार के तहत अनुसंधानकर्ता उनसे पूछताछ कर सकता है. प्रिवेंशन ऑफ करप्सन एक्ट के तहत निर्धारित नियम के आधार पर फिलवक्त पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी को पूरे मामले की जांच को लेकर अनुसंधानकर्ता बनाया गया है. मामले की मॉनीटरिंग एसपी, इओयू नवल किशोर सिंह कर रहे है. सूत्रों के अनुसार सर्विलांस के माध्यम से एकत्र किये गये वॉयस रिकार्ड व बरामद नोटों को भी बतौर सबूत न्यायालय के समक्ष पेश किया जायेगा. आवश्यकता पड़ने पर डीआइजी की गिरफ्तारी भी संभव है.
"पुलिस अधिकारी आलोक कुमार को सारण के डीआइजी पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय में वेटिंग फॉर पोस्टिंग रखा गया है. उनके ख़िलाफ़ शुरू हुई जांच से जो तथ्य सामने आएंगे, उन्हीं के मद्देनज़र उचित कार्रवाई की जाएगी. वैसे शुरुआती तफ्तीश में जो कुछ साक्ष्य मिले थे, वे संबंधित शिकायत से मेल खाते थे, इसलिए मामला दर्ज हुआ."
एडीजी रवीन्द्र कुमार, पुलिस प्रवक्ता

नोटों पर लगाया गया था केमिकल
सूत्रों ने बताया कि ट्रैपिंग के दौरान इओयू ने रंगदारी व घूस में दिये जानेवाले पांच लाख रुपये को केमिकल लगा कर दिया गया था. इससे रुपये लेनेवाले दीपक अभिषेक व अजय दूबे की उंगलियों के निशान नोटों पर अंकित हो गये है. डीआइजी के साथ नोट लेनेवालों का संबंध साक्ष्य आधारित मौजूद है.
दो कंपनियों के प्रतिनिधि हैं टुन्नाजी पांडे
शिकायतकर्ता सीवान के दरौली निवासी टुन्नाजी पांडे दो शराब कारोबारी कंपनियों के लिए प्रतिनिधि का काम करते हैं. इनमें एक दून वैली डिस्टीलर्स व दूसरा को-ऑपरेटिव कंपनी, नवाबगंज, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश है. सीवान व गोपालगंज में देशी शराब की आपूर्ति के लिए को-ऑपरेटिव कंपनी को ही उत्पाद विभाग द्वारा लाइसेंस प्रदान किया गया है.

विधान पार्षद का रिश्तेदार है उमेश
आलोक कुमार के टुन्नाजी को धमकी देने और दस करोड़ की रंगदारी मांगने में जिस उमेश को पुलिस ने गिरफ्तार किया है, वह एक विधान पार्षद का चचेरा साला है. आलोक जब पटना के एसएसपी थे, तब भी उमेश उनका खास था. शुरुआती दौर में उमेश लोजपा का कार्यकर्ता बना. दरौंदा उपचुनाव के दौरान वह जदयू में शामिल हुआ था.

Wednesday, August 15, 2012

आत्महत्या या मर्डर

पूर्व विमान पारिचारिका (एयर होस्टेस) गीतिका शर्मा की ख़ुदकुशी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. 23 साल की गीतिका की ख़ुदकुशी के पीछे हरियाणा के गृह राज्य मंत्री गोपाल गोयल कांडा द्वारा मानसिक प्रताड़ना की बात सामने आई है. सुसाइड नोट की बिना पर उक्त मंत्री के खिलाफ एफ. आई. आर. भी दायर किया गया. टीवी चैनलों को एक और मसाला मिल गया. हर चैनल इस आत्महत्या की मिस्ट्री को सबसे पहले सुलझाने में लगा है. खबर को सनसनीखेज बनाने की हर संभव कोशिश जारी है, लेकिन पूरे हंगामे में अहम बात ही गौण होती जा रही है. महज 23 वर्ष की आयु में गीतिका ने आखिर कितनी प्रताड़ना झेली होगी की उसे मौत को गले लगाना पड़ा? एक राज्य का गृह मंत्री जब ऐसी हरकत कर सकता है तो महिलाएँ खुद को कहाँ सुरक्षित महसूस करेंगी? जिस उम्र में लड़कियाँ अपने करियर और शादी के सपने देखती हैं उस उम्र में गीतिका ने दुनिया को अलविदा कह दिया. सच तो यह है कि ये किसी एक लड़की की कहानी नहीं, बल्कि अच्छे करियर का सपना देखने वाली ऐसी हजारों लड़कियों की कहानी है जो शारीरिक और मानसिक यातना की शिकार हैं. भले ही मीडिया में इक्का-दुक्का मामले सामने आते हैं, लेकिन यह हजारों कामकाजी महिलाओं और सुंदर भविष्य का सपना देखने वाली महिलाओं की कहानी है. बात भले ही आत्महत्या तक न पहुँचे लेकिन प्रताड़ना झेलने के लिए ये अभिशप्त हैं. इनमें से कई परिस्थितियों का डट कर सामना करती हैं तो कुछ अपने सपनों को समेट लेती हैं, जबकि कई इस क्रूर समाज की शिकार बन जाती हैं. इसके बावजूद आरोप इन्हीं महिलाओं पर लगाया जाता है, क्योंकि इन्होंने सपने देखने का जुर्म किया है. आम लोगों की धारणा यही होती है कि जो महिला ज्यादा महत्वाकांक्षी होती हैं उन्हीं के साथ ऐसा होता है. खुद को बचाने का इससे अच्छा बहाना और क्या हो सकता है इस समाज के पास. हमारे देश के सबसे बड़े वर्ग (मध्यवर्ग) की कुछ ऐसी ही धारणा है. यही वजह है आज भी लड़कियों की आजादी पर पाबंदियाँ लगाई जाती हैं. उन्हें हर कदम पर इस क्रूर समाज से बचाने के लिए उनके सपनों को रौंदा जाता है. जिस तरह बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों का शिकार करती हैं उसी तरह किसी भी संस्थान में ऊँचे पदों पर आसीन व्यक्ति खुद को शिकारी समझता है. ऐसा नहीं कि केवल महिलाओं को ही परेशान किया जाता है. पुरुषों के सामने भी समस्याएँ आती हैं, लेकिन इस पुरुषसत्तात्मक समाज में महिलाओं को प्रताड़ित करना आसान और आनंददायक समझा जाता है. उन्हें निचले स्तर का ही माना जाता है. महिलाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने की कोशिशें चलती रहती हैं. हर कोई मौके की तलाश में तैयार रहता है. सामनेवाले को कमजोर पाते ही वह उसपर हावी होना चाहता है. ऐसा ही कुछ गीतिका और ऐसी हजारों लड़कियों के साथ हो रहा है. आश्चर्य की बात यह है कि जो अपराधी है उसे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जिन महिलाओं को यह भुगतना पड़ता है वह बदनाम हो जाती हैं. महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का मामला हो या बलात्कार का, समाज द्वारा महिलाएँ ही बहिष्कृत होती हैं, पुरूष अपराधी नहीं. ज्यादातर लोग मानते हैं कि ग्रामीण तथा अनपढ़ महिलाएँ हिंसा या अपराध की शिकार ज्यादा होती हैं, लेकिन सच तो यह है कि पढ़ी-लिखी, कामकाजी महिलाएँ हर दिन इस इस समस्या जूझ रही हैं. महानगरों में रहनेवाली ज्यादातर महिलाओं को हर दिन इस समस्या का सामना करना पड़ता है. पिछले दिनों जब महिला पत्रकारों की स्थिति पर एक शोध किया गया तो ज्यादातर महिलाओं ने यह स्वीकार किया कि महिलाओं को प्रताड़ित करने की कोशिशें चलती रहती हैं, लेकिन किसी ने भी खुद को इसका शिकार बताने परहेज किया. मतलब साफ़ है कि उन्हें अपनी छवि धूमिल होने का डर रहता है. यही वजह है कि उनकी समस्याएँ सबके सामने नहीं आ पातीं. समय के साथ लोगों के विचार बदले हैं और महिलाओं को कार्यक्षेत्र में महत्व भी मिल रहा है. लेकिन एक बड़ा वर्ग आज भी औरतों को अपने पावों की जूती समझता है. 10 सालों से समाचार चैनल में काम करने वाली "एक महिला पत्रकार का मानना है कि पुरुष अगर थोड़े कम योग्य हों तो चल जाता है, लेकिन महिलाओं को अगर काम करना है तो उसे बिलकुल परफेक्ट होना पड़ेगा." पुरुषवर्ग हर कदम पर अपनी महिला सहकर्मियों का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. कई बार वे सफल भी हो जाते हैं. अगर सफल न भी हुए तो भले ही उस महिला को नौकरी छोड़नी पड़े उनका कुछ नहीं बिगड़ता. गीतिका ने जाते-जाते इतनी हिम्मत तो दिखाई कि मंत्री का नाम सबके सामने आ पाया. ऐसी हिम्मत अगर वह जीते-जी दिखाती तो शायद उसे ही बेगैरत का खिताब दे दिया जाता. अपराध किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समाज का है जो ऐसे अपराधी को पनाह देता है. इस तरह के सभी अपराधियों को समाज से बहिष्कृत करने की जरूरत है. जो इंसान औरत को उपभोग या मनोरंजन की वस्तु समझता है उसे इंसान कहलाने का हक नहीं....

By Aayush Rathaur
9905687845
Patna

Thursday, October 13, 2011

विज्ञापनों में शो-पिस बनती लड़कियां


बीते दिनों राष्ट्रीय महिला आयोग ने केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखकर कुछ विज्ञापनों पर लगाम कसने की मांग की। ये ऐसे विज्ञापन हैं, जिनमें स्त्री की नकारात्मक छवि पेश की गई है। दरअसल पिछले कुछ समय से ऐसे विज्ञापनों की भरमार होती जा रही है जिनमें महिलाओं को एक उत्पाद की तरह दिखाया जाता है। कुछ इस तरह जैसे वह भोग की सामान हों। आज एक क्रीम से लेकर सिम कार्ड तक के विज्ञापनों में स्त्री का यही रूप देखने को मिलता है। सिमकार्ड के एक विज्ञापन में एक लड़का फोन पर एक- एक करके दो लड़कियों को अपनी टांग टूटने की झूठी कहानी बताता है और जब उसका दोस्त उससे रुकने के लिए कहता है तो वह जवाब में कहता है कि 'जब दो पैसे में दो-दो पट रही हैं तो क्या प्रॉब्लम है।'

एक अन्य विज्ञापन में खेल के मैदान में एक खिलाड़ी अपने साथी को अपने मोबाइल पर अपनी बहुत सारी गर्लफ्रेंड्स की पिक्चर्स एक-एक करके बड़ी शान से दिखाता है, मानो उसने कोई बहुत बड़ा शाबाशी वाला काम किया हो। उसका साथी उससे बड़े आश्चर्य से पूछता है कि यार तू इन सभी को एक साथ अजस्ट कैसे करता है, और इस सवाल पर उसका सीना शान से और चौड़ा हो जाता है। यानी कि लड़कियों का अस्तित्व सिर्फ दो पैसे में पटाने से लेकर अजस्ट करने तक ही रह गया है। एक तरफ तो कहा जा रहा है कि लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। उनके सशक्त होने के दावे किए जाते हैं पर विज्ञापनों में कामयाब स्त्री कम क्यों दिखाई देती है?

दरअसल विज्ञापन बनाने वाले भी एक औसत पुरुष की आंख से ही समाज को देखते हैं। और आज का पुरुष समाज अब भी मानसिक स्तर पर स्त्री को बराबरी का दर्जा नहीं दे पाया है। वह औरत को मनोरंजन की ही वस्तु समझता है। विज्ञापनों में यही मानसिकता झलकती है। एक विज्ञापन में एक लड़की का महज खूबसूरत होना ही उसकी कामयाबी का कारण बन गया। एक और विज्ञापन में लड़की ने फेयरनेस क्रीम लगाई तो वह स्टार बन गई। वहीं जब लड़के ने वही क्रीम लगा ली तो उसका दोस्त बोलता है कि 'मर्द होकर लड़कियों वाली फेयरनेस क्रीम? यानी लड़कियां एक उत्पाद के साथ- साथ 'मर्दों' के आगे इतनी छोटी भी हैं कि गलती से भी उनकी क्रीम लगाना इन 'मर्दों' के लिए मुंह छुपाने का कारण बन जाता है। एक रिफायंड ऑइल के लगभग सभी विज्ञापनों में महिलाओं को एक हाउस वाइफ के ही रूप में ही दिखाया जाता है, जो अपने पति की बढ़ती उम्र की फिक्र करती है, और उसके लिए वह ऑइल लाती है ताकि उसकी सेहत अच्छी रहे। इस ऑइल के किसी भी विज्ञापन में यह नहीं दिखाया जाता कि पति अपनी पत्नी के लिए वह ऑयल लाया हो, मानो घर में सारा दिन काम करते रहने वाली महिला को खराब सेहत का तो कोई खतरा ही नहीं है।

मगर यहां से यह विज्ञापन पैतृक समाज की इस सोच का एक और पहलू सामने लाते हैं, वह यह कि एक ओर तो अधिकतर युवा गर्लफ्रेंड के नाम पर खूबसूरत वेस्टर्न कपड़े पहनने वाला उत्पाद अपने साथ चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर पत्नी के नाम पर एक हाउसवाइफ को ही प्राथमिकता देते हैं जो अपना करियर छोड़ कर उनके साथ अपनी जिंदगी गुजार दे। दरअसल दिक्कत समाज के एक वर्ग की सोच की है जो महिलाओं को एक दायरे से बाहर नहीं देखना चाहता है और इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस वर्ग में कुछ महिलाएं भी शामिल हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग भले ही पहल करके ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगवा दे लेकिन इससे समाज की उस सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा जो इसके लिए जिम्मेदार है। इस समस्या से निपटने के लिए सबसे जरूरी इस सोच को खत्म करना है जिसके लिए बहुत गंभीर प्रयासों की जरूरत है। और यह प्रयास महिला आयोग जैसी कोई एक संस्था नहीं कर सकती है बल्कि इसे सारे समाज को मिलकर करना होगा।

Sunday, May 22, 2011

यह संविधान इतना दोगला क्यों हैं?

: जुल्म जारी रखो.. जनता ने खामोश रहना सीख लिया है : राहुल के भट्टा परसौल पहुंचने से एक दिन पहले प्रसारित वीडियो (टीवी रिपोर्टरों के मुताबिक यह गांव से काफी दूर से लिए गए थे) में गांव जलता हुआ दिख रहा था। आग की लपटें दिख रहीं थी। जली हुई गाड़ियां दिख रहीं थी। जली हुई बाइकें दिख रही थी। जलते हुए खेत दिख रहे थे। जलते हुए भूसे और उपलों के बटोरे दिख रहे थे। मतलब..इसमें कोई शक नहीं कि आग दिख रही थी। आग लगी थी..चारो और आग दिख रही थी।

राहुल गांधी बाइक से भट्टा परसौल पहुंचे और पीछे-पीछे मीडिया भी पहुंचा। पहले यहां धारा 144 लगी हुई थी और मीडिया वालों को गांव में जाने से पुलिस ने रोक दिया था। (जबकि धारा 144 के तहक आने-जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं होता, यह सिर्फ लोगों को इकट्ठा होने से रोकती है।) मीडिया पहुंचा तो चीजें सामने आनी शुरु हुई। जी न्यूज, एनडीटीवी, स्टार न्यूज और बाकी सभी चैनलों के रिपोर्टरों ने गांव वालों को दिखाया, (मैंने यह पटना में बैठकर टीवी पर देखा)।

बुरी तरह पिटे हुए बुजुर्ग टीवी पर दिखे। चेहरे पर घाव के निशान लिए महिलाएं टीवी पर दिखी। सिसकते हुए बच्चे टीवी पर दिखे। अपनी आबरू लुटने की दुहाई देती हुई महिलाएं भी टीवी पर दिखी। पुलिस द्वारा लोगों (खासकर पुरुषों और युवाओं) को पीटे जाने की बर्बर दासतान सुनाते हुए बुजुर्ग टीवी पर दिखे। रोतो हुए बुजुर्ग दिखे, बिलखते हुए बच्चे दिखे, सिसिकती हुए माएं दिखी, तड़पती हुए बहनें दिखी।

राहुल ने यह देखा। देश ने यह देखा। मायावती ने भी जरूर देखा होगा और अफसरों ने भी देखा होगा। हां..सबने देखा। राहुल राजनीति से हैं इसलिए लोगों ने राहुल के वहां पहुंचने पर इसे देखने का नजरिया बदल लिया। अब जिसने भी देखा इसे राजनीतिक चश्मे से देखा। बीजेपी ने देखा और राहुल की आलोचना की। मायावती ने देखा राहुल की आलोचना की। कांग्रेसियों ने देखा राहुल के गुणगान गाए।

अब गांव वालों के जख्मों पर, बुझी हुई आंखों पर, लुटे हुए घरों पर, बिलखती हुए माओं पर, तड़पती हुई पत्नियों पर और भट्टा की राख में दम तोड़ रही यहां के बच्चों के सपनों को राजनीति ने ढक दिया। पूरा प्रकरण राहुल की राजनीतिक जीत या मायावती की हार में बदल गया। अब मुद्दा राजनीतिक हो गया। राहुल गिरफ्तार हुए, रिहा हुए और दिल्ली पहुंचे। गांव के पीड़ितों को लेकर प्रधानमंत्री के पास पहुंचे। प्रधानमंत्री ने भी ग्रामीणों की दास्तान सुनीं। प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद राहुल ने मीडिया के सामने कहा कि भट्टा परसौल में ज्यादती हुई, मानवाधिकारों का हनन हुआ, हत्याएं हुईं, बलात्कार हुए।

देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के 'युवराज' के मुंह से यह शब्द निकले हर अखबार की सुर्खी बने। अखबारों ने कहा भट्टा में ज्यादती हुई। टीवी ने कहा भट्टा में ज्यादती हुई। राहुल ने कहा तो सबने कहा भट्टा में ज्यादती हुई। सबने देखा भट्टा में ज्यादती हुई। सबने कह भी दिया भट्टा परसौल में ज्यादती हुई। माया ने सुन लिया। माया के अफसरों ने सुन लिया।

अगले ही दिन माया के अफसरों ने प्रेस कांफ्रेंस की। डरते हुए प्रेस कांफ्रेंस की। राहुल के हर आरोप को निराधार बताया। बयान को निराधार बताया। बुजुर्गों को पीटे जाने के निराधार बताया, महिलाओं से ज्यादती को निराधार बताया। यानि राहुल ने जो कुछ कहा उसे निराधार बताया, प्रधानमंत्री ने जो सुना उसे निराधार बताया। हमने जो टीवी पर देखा उसे निराधार बताया। कहा कि राख के नमूने यह जांचने के लिए लिए गए कि कहीं उसमें कोई विस्फोटक तो नहीं है।

इससे पहले माया ने अपने पुलिस अफसरों का गुणगान किया। भट्टा परसौल की घटना पर हो रही राजनीति की आलोचना की। अपनी सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़े। हमने सुने। आपने सुने। हम सबने सुने। राहुल बोले हमने सुना। माया बोली हमने सुना। माया के अफसर बोले हमने सुना। सब बोले हमने सुना। सब बोल चुके और अब हम खामोश। हमारी खामोशी ने बता दिया कि जिसने जो कहा सही है। राहुल ने जो कहा वो भी सही। टीवी पर जो दिखा (इसमें कोई शक नहीं हो सकता क्योंकि ये हमने सुना नहीं हमने देखा) वो भी सही। मायावती ने जो कहा वो भी सही। अफसरों ने जो कहा वो भी सही। हमने सबको सही माना और हम खामोश।

एक और बात, मुझे याद है कि एक बार मुझे समझाते हुए एक बुजुर्ग ने कहा था कि यदि तुम कहीं जुल्म होते हुए देखो तो अगर तुम्हारे बस में हो तो उसे रोक दो। कोई जालिम यदि किसी मजलूम पर जुल्म कर रहा है तो उसे रोक दो। अगर रोकने लायक ताकत तुममें न हो तो आवाज बुलंद कर यह कहो कि जुल्म हो रहा है, हो सकता है कि कोई ऐसा बंदा सुन ले जो उस जालिम को रोक सके। यदि तुम्हें इस बात का डर हो कि जालिम तुम्हारी आवाज सुन कर तुम पर भी जुल्म करेगा तो बुलंद आवाज में न सही लेकिन अपने दिल में तो कहो कि जुल्म हो रहा है। और जब तुम अपने दिल में कहोगे कि जुल्म हो रहा है तो तुम्हें अहसास होगा कि तुम कितने बेबस हो, एक जालिम को नहीं रोक सकते, जुल्म को नहीं रोक सकते, जुल्म के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते। यह बेबसी का अहसास तुम्हें जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए ताकतवर बनने की प्रेरणा देगा।

अब कुछ सवाल-

  1. क्या किसी ने यह पूछा कि जो दो गांव वाले मारे गए उनका कोई आपराधिक रिकार्ड था क्या?

  2. क्या ऐसा कोई कानून होता है जो पुलिस को घरों में आग लगाने की इजाजत देता है। या घर में ही क्यों किसी भी चीज में आग लगाने की इजाजत देता है?

  3. क्या पुलिस ने जो भट्टा परसौल में किया वो दहशत फैलाने की नियत से नहीं था? क्या पुलिस को अधिकार है कि वो बदले की भावना से कार्रवाई करे ?

  4. एक बचकाना सवाल- क्या विस्फोटकों में आग लगाई जाती है? पुलिस का कहना है कि भट्टा परसौल में ग्रामीणों ने घरों में विस्फोटक रख रखे थे? ये कहां से आए और ग्रामीणों को इनकी क्या जरूरत थी?

एक और सवाल-

हम इतने बेबस क्यों हैं। हम जुल्म देखते हैं खामोश रहते हैं। जुल्म की दास्तान सुनते हैं खामोश रहते हैं। दहशतगर्दी देखते हैं खामोश रहते हैं। दूसरे के घरों को जलता हुए देखकर हमारे दिल से धुआं क्यों नहीं उठता। हम हर बात में राजनीति क्यों देखते हैं। हम राहुल के बयानों में राजनीति दिख जाती है लेकिन जो भुस को बटोरे पुलिस ने जलाए उन्हें बनाने में लगी किसानों की मेहनत क्यों नहीं दिखती? जो गाय-भैसों के गोबर के उपले पुलिस ने जलाए उनमें लगी गांव की मां-बेटियों की मेहनत क्यों नहीं दिखती? चलो मान लिया कि पुलिस ने ग्रामीणों की जान नहीं ली...लेकिन क्या जो आगजनी हुई वो संवैधानिक है? जो नुकसान हुआ वो संवैधानिक है?

और अंतिम बात-

जो संविधान पुलिस और प्रशासन को असीमित ताकत देता है। जो सरकारों और नौकरशाहों को खास सुविधाएं देता है वो आम जनता को सम्मान से जीने का अधीकार भी तो देता है। सरकार और अफसरों को तो ताकत, दौलत, शौहरत और बहुत कुछ मिल जाता है...लेकिन बेचारी जनता को सम्मान क्यों नहीं मिल पाता। यह संविधान इतना दोगला क्यों हैं?

क्या इतने पुलिस बल का मुकाबला देश का कोई भी गांव कर सकता है?

ये बुजुर्ग जख्म ही तो दिखा रहा है। या आपको कुछ और दिख रहा है?

ये आग सबने देखी। क्या पुलिस के पास गांव में आग लगाने का कोई विशेषाधिकार है?

ये महिलाएं राहुल से क्या कह रही हैं। क्या ये जो कह रही हैं उसपर यकीन न करने की कोई वजह है?

राहुल की राजनीति को भी देखों लेकिन जनता पर अत्याचार को नजरअंदाज मत करो।


नीतीश कुमार
पटना
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Wednesday, May 11, 2011

बाल श्रम, मज़बूरी या मजदूरी

आज 21 वीं शताब्दी में बाल श्रम जैसा शब्द कर्ण अप्रिय लगता है. लेकिन हमारे समाज का ये एक घिनौना सच है. सरकार की विभिन्न योजनाओं के बावजूद इस से निजात पाना एक चुनौती बन गया है.

पेश है नीतीश कुमार की विशेष रिपोर्ट.

Tuesday, May 10, 2011

प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 6 रुपये 42 पैसे का खर्च



बिहार सरकार प्रत्येक बिहार वासी पर प्रत्येक दिन 6 रुपये 42 पैसे खर्च करती है। राज्य सरकार इसी पैसे से शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और खाद्यान्न आदि का प्रबंध करती है। यह आंकड़ा पूरी तरह सरकारी है। वर्ष 2011 की जनगणना के बाद यह तथ्य स्पष्ट हुआ है कि बिहार में प्रति व्यक्ति औसत आय 11 हजार रुपये की सीमा को पार कर चुकी है। इस लिहाज से एक बिहारी की रोजाना आय केवल 30 रुपये है। अर्थार्त प्रत्येक बिहारी नागरिक की अपनी आय केवल 23 रुपये 58 पैसे हैं।

अब यदि सरकारी खर्च की बात करें तो यह महज संयोग नहीं है कि सरकार सबसे अधिक खर्च शिक्षा उपलब्ध कराने के लिये करती है। मसलन बिहार सरकार ने मानव संसाधन विकास विभाग के मद में वर्ष 2011-12 के दौरान कुल 24000 करोड़ रुपये के अपने योजना आकार में से 3014 करोड़ रु[पये खर्च करने की योजना बनाई है। वर्तमान जनसंख्या से भाग देने पर जो राशि प्राप्त होती है, उसके अनुसार बिहार सरकार प्रति माह 24 रुपये 20 पैसे शिक्षा के मद में खर्च करती है। इसी प्रकार 4 रुपये 35 पैसे की सहायता राज्य सरकार सूबे के एक नागरिक के स्वास्थ्य का ख्याल रखती है। जबकि पीने हेतु पेयजल और खेतों में सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराने के लिये राज्य सरकार प्रति मात 24 रुपये 17 पैसे खर्च करती है।

खेती के सहारे बिहार को विकसित बनाने के लिय राज्य सरकार की दृढता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है राज्य सरकार प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से प्रतिमाह 9 रुपये 75 पैसे खर्च करती है। अन्य विभागों की बात करें तो सूबे के अल्पसंख्यकों के लिये सरकार का हृदय अत्यंत ही विशाल है। ऐसा इसलिये कि सूबे के प्रत्येक अल्पसंख्यक नागरिक पर राज्य सरकार प्रतिमाह 4 रुपये 83 पैसे खर्च करती है। बताते चलें कि सूबे में अल्पसंख्यकों की आबादी कुल आबादी का 15 प्रतिशत (पूर्व में यह 16 फ़ीसदी हुआ करता था) राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के लिये कुल 90 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

सामाजिक दृष्टिकोण से राज्य सरकार सबसे अधिक राज्य के अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर मेहरबान है। इसकी वजह यह है कि इन समुदायों के प्रत्येक व्यक्ति के लिये राज्य सरकार ने प्रत्येक माह 24 रुपये 17 पैसे खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। हालांकि राज्य की आबादी में 60 फ़ीसदी हिस्सेदारी रखने वाले पिछड़ों और अति पिछड़ों के लिये सरकार ने प्रति माह केवल 92 ही खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

बहरहाल, यह उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा स्थापना एवं अन्य पूर्व निर्धारित मदों ( जिनका संबंध आम जनता से नहीं होता है) के तहत कुल राशि का 36-37 फ़ीसदी हिस्सा खर्च कर देती है। इस प्रकार प्रति व्यक्ति होने वाले सरकारी खर्च का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है।
एक बिहारी पर माहवार सरकारी खर्च

विभाग का नाम
खर्च

मानव संसाधन विकास विभाग
24.20 रुपये

स्वास्थ्य विभाग
04.35 रुपये

उद्योग विभाग
00.33 रुपये

जल संसाधन विभाग
24.17 रुपये

कृषि विभाग
09.75 रुपये

अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण
24.17 रुपये

पिछड़ा/अति पिछड़ा वर्ग
00.92 रुपये

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग
04.83 रुपये



श्रोत – बिहार सरकार द्वारा जारी बजट और वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट के आधार पर






Nitish Kumar



Mob.- 9534711912

Sunday, April 3, 2011


28 साल बाद भारत ने दोहराया इतिहास


28 वर्षों का लंबा इंतजार कल खत्म हो गया। भारतीय क्रिकेट टीम ने महेंद्र सिंह धोनी के नेतृत्व में श्रीलंका को 6 विकेट से हराकर सवा अरब भारतीयों को खुशी का ऐसा लम्हा दिया, जिसमें पूरा देश सराबोर हो उठा। मैच के दौरान ऐसे अनेक पल आये जब नाटकीय स्थिति बनी रही। सबसे पहले टॉस को लेकर एक बार अनिश्चितता की स्थिति बन गई थी क्योंकि पहली बार जब सिक्का उछाला गया तो मैच रेफ़री सुन नहीं पाए कि कुमार संगकारा ने क्या कहा. उसके बाद दोबारा टॉस करना पड़ा और श्रीलंकाई कप्तान कुमार संगकारा ने टॉस जीतने के बाद पहले बल्लेबाज़ी का फ़ैसला किया.

पहले बल्लेबाज़ी करते हुए श्रीलंका ने छह विकेट के नुक़सान पर 274 रनों का चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया और इसमें महेला जयवर्द्धने के शतक की अहम भूमिका रही.

जवाब में भारत की जीत में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और गौतम गंभीर ने एक अहम भूमिका निभाई. धोनी ने 79 गेंदों में 91 रन बनाकर नॉट आउट रहे जबकि गंभीर 97 रन बनाकर वह तिसारा परेरा की गेंद पर बोल्ड हुए. शुरुआती झटकों के बाद गौतम गंभीर और विराट कोहली मिलकर पारी को संभाल रहे थे इस साझेदारी की बदौलत भारत ने अपने 100 रन भी पूरे कर लिए थे.

जैसे ही भारत ने श्रीलंका पर जीत हासिल किया, पूरे देश के साथ-साथ बिहार भी झुम उठा। राजधानी पटना में तो पूरा आकाश रंग-बिरंगी आतिशबाजी का गवाह बना। लोग पूरे उत्साह के साथ भारत माता की जय का नारा लगाते दिखे। भारत के विश्व चैम्पियन बनने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी सहित अनेक नेताओं ने शुभकामना दी। उधर राजधानी पटना में भी कई स्थानों पर लोगों ने सामूहिक रुप से मैच का आनंद लिया।

भारतीय क्रिकेट टीम के विश्व चैंपियन बनते ही खिलाड़ियों पर पैसे और पुरस्कारों की बारिश होने लगी है। इसकी शुरुआत सबसे पहले बीसीसीआई ने टीम के हर खिलाड़ी को एक-एक करोड़ रुपये देने की घोषणा के साथ की। भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान ही टीम के सभी 15 सदस्यों को एक-एक करोड़ रुपये, कोच गैरी कर्स्टन और उनके सहयोगी स्टाफ में से प्रत्येक को 50 लाख रुपये देने की घोषणा की। बीसीसीआई ने इसके साथ ही चयन समिति के प्रत्येक सदस्य को 25 लाख रुपये देने का भी ऐलान किया। इसके अलावा टीम इंडिया को विश्व विजेता बनने पर चमचमाती ट्रोफी के अलावा साढ़े 32 लाख डॉलर की भारी भरकम इनामी राशि भी मिली, जिससे टीम का हर खिलाड़ी बीसीसीआई की घोषणा से पहले ही एक-एक करोड़ का मालिक बन गया था। दिल्ली सरकार टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को दो करोड़ रुपये और दिल्ली के खिलाड़ी-गौतम गंभीर, वीरेंद्र सहवाग, विराट कोहली और आशीष नेहरा को एक-एक करोड़ रुपये बतौर इनाम देगी। गुजरात सरकार ने अपने सूबे के खिलाड़ियों यूसुफ पठान और मुनफ पटेल को सर्वोच्च खेल पुरस्कार एकलव्य अवॉर्ड देने की घोषणा की है।


इस मौके पर मेरी आखें नाम थी. ख़ुशी इतनी की मुँह से कुछ बयां भी नहीं कर सकता. पर सर तो गर्व से ऊँचा था. आज उन 11 खिलाड़िओं ने वो कर दिखाया जो 28 वर्षों से हर भारतबासियों का सपना था. पहले जब घर में पापा कपिल देव के ज़माने की क्रिकेट की बात करते थे और कहते थे की उसने भारत को विश्व कप दिलाई तो दिल में एक आस जगती थी की काश मै भी उस मैच का गवाह होता. आज जब भारत ने ये मुकाम हासिल किया तो दिल भर गया पर हर लम्हा दिल में बसा है. और ये है कभी न भूलने वाला पल. 02 अप्रैल 2011..

जय हिंद


नीतीश कुमार.

Mob.- 9534711912

Sunday, March 27, 2011


खेल होमोसेक्शुअलटी का


मुंबई।। फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस मामले में नए एक्टर के आरोप से बदलते बॉलिवुड का असली चेहरा सामने आ गया है। होमोसेक्शुअलटी पर बनी एक फिल्म में काम कर चुके युवराज पराशर ने ' माई ब्रदर निखिल ' , ' बस इक पल ' जैसी संवेदनशील फिल्में बना चुके डायरेक्टर ओनीर पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। हालांकि , ओनीर का कहना है कि मैं गे हूं यह बात कभी छिपाई नहीं और जो कुछ भी हुआ, वो आपसी सहमति से हुआ है। उन्होंने युवराज के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी है। आगरा के रहने वाले 28 वर्षीय युवराज फिलहाल फिल्म इंडस्ट्री में पांव जमाने की कोशिश कर रहे हैं। वह पिछले साल जीनत अमान के साथ होमोसेक्शुअलटी पर एक फिल्म में काम कर चुके हैं, जो फ्लॉप रही थी। युवराज का कहना है, ' मैंने काम पाने के लिए मधुर भंडारकर और ओनीर से मेरी फिल्म देखने की गुजारिश की थी। भंडारकर ने बिजी शेड्यूल का हवाला देकर फिल्म देखने से मना कर दिया लेकिन ओनीर तैयार हो गए। उन्होंने मंगलवार को वर्सोवा स्थित अपने घर पर साथ फिल्म देखने के लिए बुलाया। ' ऐक्टर ने कहा , ' मैं रात पौने ग्यारह बजे ओनीर के घर पहुंचा और हम लिविंग रूम में डीवीडी पर फिल्म देखने लगे। इस दौरान डायरेक्टर ने मुझे 6-7 पैग शराब पिलाई। फिल्म के बीच में ओनीर ने कहा कि चलो बची फिल्म बेडरूम में देखेंगे। ' युवराज का आरोप है कि वहां डायरेक्टर ने उनके साथ बदसलूकी की। दूसरी तरफ ओनीर का कहना है कि युवराज शारीरिक रूप से मेरे से मजबूत हैं और ऐसे में उनके साथ मैं जबरदस्ती नहीं कर सकता। ओनीर का कहना है कि जो कुछ भी हुआ आपसी सहमति से हुआ लेकिन अब सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए युवराज यह सब कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह युवराज पर मानहानि का दावा करने जा रहे हैं।


नीतीश कुमार


Mob.-9534711912


था कोई अजनबी. दिल जो हमारा ले गया, था कोई अजनबी. एक सहारा सा दे गया था कोई अजनबी. रुख्शत किया हमें उसने इतनी बेरुखी से, और सिकवा दे गया था कोई अजनबी. जिंदगी है छोटी और रास्ते है लम्बे, तनहा जो छोड़ गया,था कोई अजनबी. गम नहीं है ज़ख्मों का,जो अपनों से मिला, जो दिल तोड़ के गया, था कोई अजनबी. आखें जो ढूंढ़ती है, वो तस्वीर नहीं कोई, जो ख्वाबों में छा गया. था कोई अजनबी.. नीतीश कूमार Mob.-9534711912

Friday, March 11, 2011


गोरखनाथ में गोरखधंधा

पटना।। पैरंट्स सावधान ! पटना में साइबर कैफों में छापे के दौरान कॉन्डम मिले और करीब 40 जोड़ों को आपत्तिजनक हालत में पाया गया। एक साइबर कैफे में तो क्यूबिकल्स में बेड तक लगे हुए थे। पुलिस ने बताया कि इनमें से ज्यादातर कपल्स अच्छे परिवार से ताल्लुक रखने वाले 16 से 18 साल के टीनएजर्स हैं। एसपी ( सिटी ) शिवदीप लांडे ने बताया कि गांधी मैदान, कदमकुआं, पीरबहोर, कोतवाली और बुद्धा कॉलोनी के 12-13 साइबर कैफों में छापे के दौरान हमने जो देखा वह चौंकाने वाला था। उन्होंने बताया कि रेड पड़ते ही टीनएजर कपल्स ने भागने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। सबको थाने ले जाया गया लेकिन लड़कियों को वॉर्निंग देकर छोड़ दिया गया। एसपी सिटी ने कहा कि उनकी हिरासत से परिवारों की प्रतिष्ठा को धक्का लगता, इसलिए यह कदम उठाया गया। लड़कों को हिरासत में लेने के बाद उनके पैरंट्स को बुलाया गया और पर्सनल बॉन्ड भरवाने के बाद छोड़ गया। पुलिस ने कहा कि जिन साइबर कैफों से कॉन्डम मिले हैं, उनके मालिकों को गिरफ्तार किया जाएगा। दरअसल, पुलिस को लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं कि साइबर कैफों की आड़ में कुछ और ही खेल चल रहा है। इसके मद्देनजर कई थाना क्षेत्रों की पुलिस ने विशेष जांच अभियान छेड़ा। बोरिंग रोड के गोरखनाथ काम्प्लेक्स में लगभग एक घंटा तक चली कार्रवाई के दौरान लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। चार कैफों में आपत्तिजनक सामान भी मिला है। सात लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। कई कैफों में सिंगल एंट्री पर 10 और कपल के साथ 20 रुपये की रेट लिस्ट भी कहानी बयां कर रही थी। क्यूबिक में कंप्यूटर के साथ दराज में आपत्तिजनक कॉन्डम रखने वाले साइबर कैफों ने केबिन के प्रति घंटा रेट काफी ऊंचा रखा है।

आपको ये भी याद दिलाते चले की एक दिन पहले ही पटना पुलिस ने राजा बाज़ार स्थित चौरसिया रेस्तरां में छापा मारकर काफी लड़के लड़कियों को पकड़ा था.
और तब भी काफी अफरातफरी का माहौल था....

पर आज ऐसे जगहों पर छापा मारना तो सही है पर इस से एक सवाल भी पैदा होता है....
आज जहा हमारे संबिधान में LIVE IN RELATIONSHIP की बात हो रही है वही ऐसे जगहों पर छापा मरना कितना सही है?
ये सवाल मै साइबर कैफे को लेकर नहीं बल्कि रेस्तरां में मारे गये छापे को लेकर उठा रहा हूँ.
सोचने वाली बात ये है की अगर लड़का लड़की राज़ी है तो किसी को फिर क्या दिक्कत है??
और LIVE IN RELATIONSHIP के अंतर्गत हमारी संबिधान भी तो यही कहती है..

आप इस पर अपनी राय जरुर दे.

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Nitish kumar

Mob.- 9534711912

Tuesday, March 8, 2011

TUM MERI JAAN HO

Meri Rooh Nikalne Wali Hogi

Meri Sans Bikharne Wali Hogi
Phir Daman Zindgi Ka Chute Ga

Dhaga Sans Ka Bhi Tute Ga
Phir Wapis Hum Na Aayenge

Phir Hum Se Koi Na Roothe Ga
Phir Ankhon Me Noor Na Hoga

Phir Dil Gham Se Choor Na Hoga
Us Pal Tum Hum Ko Thamo Ge

Humay Dost Apna Mano Ge
Phir Hum Na Kuch B Bolien Ge

Ankhen Bhi Na Kholien Ge
Us Pal Tum Ro Do Ge

{BAS PHIR TUM HUM KO KHO DO GAY}

Tum Aksr Sochty Hon Gy

Hum Tumhein Yaad Nhi Krty
Tumhein Hum Bhool Jate Hein

Mgar Ye Bhool Tumhari Hy
Asal Mein Baat Kuch Yun Hy

K Jab Tum Yaad Aate Ho
To Kuch B Yaad Nahi Rehta

Or Tumhari Yaad Mein Kho Kr
Hum Batana Bhool Jate Hein

K Tum Kitna Yaad Aate Ho..!

Dedicated To My LOVE "SweetU"

Thursday, January 6, 2011


पापी पेट के खातिर


चिराग जलाने की कोशिश,

घर हमने जलते देखा है,

पेट पालने की खातिर,

कोई पेट मैं पलते देखा है,


भूखी माँए रोते बच्चे,

तन नंगा और मन नंगा,

एक दिन के चावल को ही,

हो जाता है बदन नंगा,

इस युग मैं हर मोड़ पे हमने,

सीता को हरते देखा है,


खुश दिख कर यहाँ करने पड़ते,

बदन के सौदे रातों मैं,

बदन के लालची भेडिये,

रहते सदा ही घातों मैं,

यहाँ द्रोपदी को चीर हरण,

खुद अपना करते देखा है,


सोने वाले सो नही पते,

रात यहाँ सो जाती है,

जग की जन्म देनी माँ,

खुद गर्त मैं खो जाती है,

पेट की खातिर खुद ही हमने,


खुद को छलते देखा है,

चिराग जलाने की कोशिश,

घर हमने जलते देखा है,

पेट पालने की खातिर,

कोई पेट मैं पलते देखा है,


नीतीश कुमार

Mob.- 9534711912

Saturday, January 1, 2011



हुनर के धनि कलाकार को है मंच की तलाश

जिन्दगी एक अभिलाषा है, क्या गजब इसकी परिभाषा है.
संवर गई तो दुल्हन और बिखर गई तो तमाशा है.

प्रसिद्ध कवि दुष्यंत की ये पंक्तियाँ हर किसी की जिन्दगी पर बिलकुल सटिक बैठता है. कहते है जब किसी इंसान में हुनर हो तो मंजिल खुद उसका कदम चूमती है. पर हमारे बीच एक ऐसे व्यक्ति भी है जिनमे हुनर तो कूट-कूट कर भरा हुआ है पर अपनी पहचान बनाने के लिए वो दर दर भटक रहा है. ये है नवादा जिले के रामनगर निवासी विकास विश्वकर्मा जो महज 20 साल की उम्र में बिना कोई प्रशिक्षण लिए हर योगाभ्यास कर लेता है.
बाबा रामदेव को अपना आदर्श मानने वाला विकास हर व्यक्ति तक योग शिक्षा पहुचना चाहता है. गौरतलब हो की योग के प्रति रुझान के कारन वह शरीर को रबड़ की तरह मोड़ लेता है. इतना ही नहीं वह अपने ज्ञानेन्द्रियों को भी वश में कर लेता है जिससे शारीर को कुर्सीनुमा बनाकर बिना टेबुल के सहारे ही भोजन कर सकता है. ज्ञानेन्द्रियों पर वश ऐसा की वह अपने बाल को आगे पीछे, पेट को फुटबाल नुमा और कान को जिस तरह चाहे घुमा सकता है. हाथ पीछे कर के भोजन करना और लोगों को पीछे से प्रणाम करके वह सभी को आश्चर्य में डाल देता है. कला का धनि विकास अनेक कलाकार की आवाज़ भी निकालता है. विकास की आवाज़ में मिथुन, अजीत, जगदीप, सत्रुघ्न सिन्हा, एहशान कुरैशी के आलावा विविध भारती के प्रसिद्ध एनाउंसर अमीन शयानी भी शामिल है.
इतना हुनर होते हुए के वावजूद भी विकास को तलाश है एक ऐसे मंच की जो उसे पहचान दिला सके. अपने मार्ग में वह गरीबी को सबसे बड़ा रोड़ा मानता है. विकाश कहता है की ये सब कलाबाजियां उसमे ईश्वरीय देन है, लेकिन प्रशिक्षण की अभाव में उसे इन कलाओं की बारीकियों और इससे होने वाले लाभ के बारे में उसे नहीं पता है.
विकास के पिता वासुदेव विश्वकर्मा जो पेशे से ड्राईवर है बताते है की विकास को बचपन से ही योग के प्रति गहरा रुझान रहा है पर आर्थिक स्थिति दयनीय रहने के कारन ही उसका विकाश बाधित है. उन्होंने जिला प्रशासन से उमीद जताते हुए सहयोग की मांग भी की थी पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ. वो चाहते है की विकास अपने प्रदेश और राज्य का नाम रौशन करे जिसके लिए वो कला एवं सांस्कृतिक विभाग से सहयोग की उमीद जताते है.विलक्षण कलात्मक प्रतिभा का धनि विकास की उड़ान ऊँची हो सकती है, बशर्ते आर्थिक संसाधनों की कमी दूर हो.

नितीश कुमार
इन्द्रपुरी, पटना

Mob.- 9534711912

Monday, December 27, 2010


निजी शैक्षनिक संस्थाओं की गिरफ्त में पुस्तक मेला

पटना: 19 अगस्त,2010
आह मुझे बचाओ-आह मुझे बचाओ!!
ये दर्द किसी लाचार या विवश व्यक्ति की नहीं बल्कि अक्षरों का संग्रह कही जाने वाली पुस्तकों की है. हम बात कर रहे है पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान की जो इस समय दुल्हन की तरह सज कर तैयार है, मौका है पुस्तक मेले का.
वैसे ये बड़े गौरव की बात है की इस वर्ष हम कुछ कवियों की जन्म शताब्दी मना रहे है. इन कवियों में बहुप्रसिद्ध जनकवि नागार्जुन, अब्दुल फैज और अग्य का नाम सबसे ऊपर आता है. कहने को फैज के नाम से प्रवेश द्वार है, अग्य का नाम प्रसाशनिक भवन पर अंकित है और नागार्जुन का नाम भी मुक्ता आकाश मंच पर है. पर सच माने तो होर्डिंग्स, फ्लैक्स और विभिन्न संस्थाओं की बैनर की भीड़ में इनके नाम पर नजर जाती ही नहीं. आजकल के युवा तो इन कवियों का नाम तक नहीं जानते. ऐसे में इनकी जन्म शताब्दी वर्ष मानाने का ये तरीका महत्वहीन साबित होता है.
कहने को तो ये पुस्तक मेला है पर ये पूरी तरह से निजी शैक्षनिक संस्थाओं की गिरफ्त में है. पुरे पुस्तक मेले में जहाँ भी जाये किसी न किसी शैक्षनिक संस्थाओं की बैनर दिख ही जाती है. इतना ही नहीं पुस्तक मेले के प्रवेश टिकट पर भी ऐसे ही शैक्षनिक संस्था का मुहर है. ऐसे में किताबों की नगरी बाज़ार की तरह प्रतिक होती है.
इस से अलग इस पुस्तक मेले में अनेकों खामियां है जो इसके प्रसाशनिक विभाग पर सवालिया निशान खड़ा करती है. पुस्तक मेला पूरी तरह धुल से सना हुआ है, और ध्वनि प्रदुषण भी चरम पर है. शैक्षनिक संस्थाओं के प्रचार की गूंज में महत्वपूर्ण जानकारियां हमारे कानों तक पहुचती ही नहीं. और किसी भी छोटी-बड़ी घटनाओं के लिए अन्दर कोई प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नहीं है.
मेले में बिहारशरीफ से आये एक पुस्तक प्रेमी विकाश दुबे जो पेशे से किसान है का कहना है की ये पुस्तक मेला नहीं बल्कि लूट मेला है. यहाँ सभी किताबों का दाम काफी ज्यादा है जो बाहर कम मूल्यों में उपलब्ध है. एक अन्य पुस्तक प्रेमी पटना के नवीन की माने तो यहाँ विभिन्न सुविधाओं की कमी है और यहाँ नामचीन पुस्तक प्रकाशक नहीं है.
उदघाटन समारोह में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अंतराष्ट्रिय प्रकाशनों को बुलवाने की बात कह रहे थे जिस से इस पुस्तक मेले की गरिमा और बढे. पर मेले की ऐसी स्थिति में "पयोनीर" और अन्य नामचीन प्रकाशनों को यहाँ बुलवाना मुस्किल लग रहा है. अगर हमें पटना पुस्तक मेले को अंतराष्ट्रिय पहचान दिलानी है तो इन सभी कमियों को दूर करना होगा और मेले पर हावी होता बाजारवाद को रोकना होगा.
नीतीश कुमार
इन्द्रपुरी,पटना
Mob.- 9534711912, 9263633170

जिंदगी से होकर मजबूर , समाज मे बढ़ रहे बाल मजदूर

बच्चे परिवार, राज्य और देश के भविष्य होते हैं. लेकिन तब जब परिवार, राज्य और देश उन्हें खुशहाल जीवन जीने की सारी सुभिधाएँ उपलब्ध कराए. किंतु जब यही बच्चे महज खेलने और पढ़ने की उम्र मे अपने कंधे पर परिवार के भरण-पोषण के लिए हड़तोड़ मेहनत करने को मजबूर हो जाये तो उन्हें परिवार, राज्य और देश का भविष्य कैसे कहा जा सकता है?
हम बात कर रहे है देश मे ऐसे लाखों बाल मजदूरों की. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है की हमारा देश वैसे देशों की श्रेणी में गिना जाता है जहाँ बाल मजदूरी चरम पर है. इतना ही नहीं इन बाल मजदूरों से बेहद अधिक काम लिया जाता है और बदले में इन्हें काफी कम मेहनताना दिया जाता हैं. ठिठुरते ठण्ड और झुलसते गर्मी में हाड़तोड़ मेहनत करने के बावजूद बाल श्रमिकों को मजदूरी के नाम पर नाममात्र रूपये का भुगतान किया जाता है. इन सब के बावजूद हर छोटी-छोटी बातों पर इन्हें मालिकों की दुत्कार सुननी पड़ती है. कचरा, पलास्टिक, पेपर चुनने वाले, स्टेशनों पर अखबार या खाने – पीने की सामग्री बेचने वाले या जूते पॉलिस कर अपना पेट पालने वाले ये मजदूर प्रत्यक्ष रूप से किसी के अधीन तो काम नहीं करते पर समाज में इनका शोषण किया जाता है. समाज के भेडियें और दरिन्दे इन बाल मजदूरों का यौन शोषण करने में भी पीछे नहीं रहते.
बेहद कम उम्र में मेहनत मजदूरी और मानसिक तनाव के कारण ऐसे बच्चों की मानसिक विकाश भी रुक जाती है. गलत संगती में पड़ कर ऐसे बच्चे तम्बाकू, शराब और अन्य नशीली पदार्थों का सेवन भी करने लगते है.
ऐसा नहीं की सरकार की नजर इन पर नहीं पड़ती. सरकार ने ऐसे अनेकों कानून बनाये है जिस से बाल मजदूरी को रोका जा सके. कितने ऐसे एनजीओ भी बाल मजदूरी रोकने के लिए कार्य कर रही है फिर भी इस अभिशाप से छुटकारा पाना मुश्किल साबित हो रहा है.
हाल ही में खबर मिली की बिहार के बेगूसराय जिले में बरौनी रेलवे जंक्शन से रेल सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने पश्चिम बंगाल के 12 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है और इस मामले में लिप्त दो ठेकेदारों को गिरफ्तार किया है. अधिकारियों की मानें तो सभी बाल श्रमिकों ने किशनगंज से महानंदा एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी थी और वे पंजाब के लुधियाना में आलू के खेतों में काम करने जा रहे थे. गिरफ्तार किये गये दोनों ठेकेदारों ने दावा किया की बाल श्रमिकों के अभिभावकों को इसकी जानकारी दी गयी थी और इसके बदले उन्हें एक से दो हज़ार दिए गये थे.
एक अन्य जानकारी के मुताबिक ऐसी ही घटना देश की राजधानी से मिली. बाल मजदूर के रूप में दिल्ली ले जाए गए झारखंड के तीन लड़के एवं एक लड़की को वापस लाने में स्वयंसेवी संगठनों ने सफलता हासिल की. इन बच्चों को नजदीकी रिश्तेदारों ने ही काम दिलाने के बहाने एक घर में छोड़ दिया था.
ऐसी घटनाओं पर गौर करें तो ये बात सामने आती है की बाल मजदूरी के लिए सरकारी साहूकारों से ज्यादा हम सभी जिम्मेदार है. आखिर इसे अपने घर समाज से मिटाने के लिए पहल तो हमें ही करना पड़ेगा. तो इस नन्हे मासूम की सार्थक और उज्जवल भविष्य के लिए इनके हाथों में मज़बूरी की जंजीरों से बांधने के बजाय हमें इन्हें अक्षरों की दुनिया में खेलने के लिए भेजना चाहिए.
तभी देश के भविष्य कहलाने वाले ये बच्चे अपना हुनर निखार सकेंगे और देश के विकाश में मजबूत नीव खड़ा करेंगे.

नीतीश कुमार
इन्द्रपुरी,पटना
Mob.- 9534711912, 9263842363

Wednesday, November 24, 2010

नीतीश की आंधी में राजद, कांग्रेस उड़े
पटना: बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के सुशासन पर दोबारा अपनी मुहर लगा दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज राजभवन गए और राज्यपाल देवानंद कुंवर को अपना इस्तीफा सौंपा. नीतीश कुमार 26 नवम्बर को दुबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे.
इधर चुनाव परिणाम के रूझान आते ही जदयू व भाजपा कार्यालय में जश्न का माहौल कायम हो गया. नेता व कार्यकर्ता एक दूसरे को मिठाइयां बांटी व पटाखे छोडे. लालू और पासवान की पार्टियों की करारी हार हुई. राजद व लोजपा कार्यालय का माहौल बिलकुल सुनशान सा रहा. जबकि सबसे ज्यादा झटका कांग्रेस को लगा जो दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुची.
उधर नीतीश कुमार व भाजपा के सरकार को बधाई देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कहा की बिहार से हमें ज्‍यादा उम्‍मीद नहीं थी.यही वजह रही कि कांग्रेस ने किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं किया. वही राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद ने इस चुनावी नतीजे को रहस्यमय बताया. उन्हीने कहा की यह परिणाम जादुई है.हम पता करेंगे की ये जादू कैसे हुआ.हम हार-जीत की समीक्षा करेंगे.
वैसे किसी भी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए 122 सीटों के जादुई आकडे की जरुरत थी.

अगर चुनावी नतीजे को गौर से देखे और पिछले चुनाव से तुलना करे तो आकड़ा वाकई जादुई रहा.

बिहार विधानसभा चुनाव 2010 के नतीजे

पार्टी
243 सीटें आगे/ जीते
एनडीए (बीजेपी +जेडीयू)
202
आरजेडी + एलजेपी
25
कांग्रेस
7
निर्दलीय और अन्य
9


बिहार विधानसभा चुनाव 2005 के नतीजे

पार्टी
आगे /जीते
एनडीए (बीजेपी +जेडीयू)
14 3
आरजेडी +
6 4
अन्य
32

Sunday, November 21, 2010


स्कूल में छात्र की मौत
पटना:गाँधी मैदान स्थित क्राइस्ट चर्च स्कूल में शुक्रवार की सुबह 10 वीं कक्षा के छात्र मोहित(16) की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई मोहित की मौत की खबर जब उसकी माँ संध्या को मिली तो वह मूर्छित हो गई संध्या का कहना था कि सुबह 8 बजे हीं उन्होने अपने बेटे को हसते हुए घर से विदा किया था
मोहित के दोस्तों ने बताया कि सुबह प्रार्थना सभा में भाग लेने के बाद मोहित बाथरूम गया था, वहाँ से क्लास जाते वक़्त वह मूर्छित होकर गिर गया जबकि एक अन्य छात्र राहुल राज व छात्रा मेघा सुल्तानिया भी बीमार पड़ गये जब जानकारी स्कूल के प्राचार्य को मिली तो उन्होने तुरंत तारा हॉस्पिटल भेजा जहा बाद मे मोहित कि मौत हो गई
मोहित की मौत के लिए उनके पिता मदन मोहन गुप्ता ने स्कूल प्रसाशन और अस्पताल पर लापरवाही बरतने व मामले को छिपाने का आरोप लगाया है उनका कहना था कि स्कूल के पानी मे कोई ज़हरीला पदार्थ मिला होगा जिसके पीने से उनके बेटे की मौत गई
उनका बड़ा बेटा निखिल संत जेवियर स्कूल मे 12 वीं कक्षा मे पढ़ता है.
अगर ऐसे मामलों पर गौर करे तो ये कोई पहली घटना नही है जब किसी स्कूल प्रसाशन पर लापरवाही बरतने का आरोप लगा है इस से पहले भी पिछले साल क्राइस्ट चर्च स्कूल के ही एक छात्र श्रेय संजय का गाँधी मैदान के निकट से अपहरण हो गया था और एक घटना करीब डेढ साल पहले डीएवी, बीएस्‌इबी कॉलोनी के छात्र के साथ भी हुई थी जब सातवीं कक्षा का छात्र आयुष की संदिग्ध परिस्थितियों मे मौत हो ग्यी थी तब स्कूल पर छात्र को बेहरमी से पिटाई करने का आरोप लगा था
अब ज़रूरत है की स्कूल ऐसी मामलों पर सजग और सहज रुख़ अपनाए और ऐसी घटनाओं पर कोई लापरवाही ना बरते क्योकि स्कूल मे छात्रों के भविष्य का निर्माण होता है भविष्य का विनाश नही.

Monday, October 11, 2010


" भिक्षुक "


वह आता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक,

मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।


साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,

बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,

और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।

भूख से सूख ओठ जब जाते दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?--

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!